Tuesday, 29 August 2017

पछताती हो क्यों...

हाँ, सही कहा कि
ग़र करती हो तो पछताती हो क्यों...?
अपने पहनावे पर
लोगों के व्यंग्यबाण सुन
तुम शर्म से गढ़ जाती हो क्यों...?
तुम्हारे कपड़ों की लंबाई देख
तुम्हें करैक्टर सर्टिफिकेट देने वालों की
बातों से तुम घबराती हो क्यों?
पछतावा तो हो उन आंखों को
जो कभी तीर, कभी भाले बन
तुम्हारे ज़िस्म में उतर जाती हैं।
पछतावा हो उस बेगैरत नज़र को
जो स्कैनर बन, तुम्हारे लिबास के भीतर
एक देह की कल्पना मात्र से
लार टपकाने, कभी लपलपाने लगती है।
पछतावा हो उस तथाकथित सभ्यता को
जहां अँधेरा होते ही
मर्दाना ज़िस्म पहने कुछ इंसान
जनाने जिस्मों-गोश्त की बू सूँघते,
वहशी दरिंदे बन घूमते हैं।
हाँ, तुम्हारे छोटे कपड़े, पारदर्शी लिबास ,
भड़काते हैं उन्हें।
पर
किसी घर के पालने में सोई, कहीं स्कूल जाती
गली और पार्कों में खेलती
वे छोटी-छोटी अबोध बच्चियाँ
क्या दिखा कर उत्तेजित करती हैं उन्हें?
प्रौढ़ और वृद्ध स्त्रियों के
झुर्रियों से भरे ज़िस्म
कैसे उनके अवयवों में रक्त संचार बढ़ा देते हैं?
कैसे फटे-चीथड़े पहने,
धूल-मिट्टी से अटी देह और बिखरे बाल लिए
विक्षिप्ता हामिला हो जाती है?
तो , तुम ही क्यों पछताती हो
कि तुम्हारा लिबास उकसाता है उन्हें
दोष तो उनका है जिन्हें औरत में
एक इंसान नहीं
सिर्फ ज़िस्म नज़र आता है।

Thursday, 3 August 2017

कोयला है, जितना पौंछो, काला ही नज़र आएगा।

आइना थोड़े ही है जो पौंछ कर चमक जाएगा।
कोयला है, जितना पौंछो, काला ही नज़र आएगा।

है बसी रग-रग में हरकत, फितरती है उसका मिजाज़।
तुमने क्या सोचा कि समझाने से वो बदल जाएगा।

बाँध तूफां को अपने पालों में चलता है जो।
वो सफ़ीना आँधियों के रुख से क्या दहल जाएगा।

गर्दिशों ने है सँवारा, ठोकरों ने है सँभाला ।
काँच समझा है क्या उसे, जो छूते ही बिखर जाएगा।

एक दूजे की टाँग को जकड़े खड़े हैं लोग देखो।
देखते हैं कौन, किससे, कैसे अब आगे निकल पाएगा।
~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

Tuesday, 25 July 2017

हसरत नई हर रोज़ ही मचलती तो है


इस मोड़ से इक राह भी गुजरती तो है
दिल से तेरे हम तक जो पहुँचती तो है .

किस्मत तो किस्मत है, यकीं न इस पे करना
किस्मत हरेक की नए रंग बदलती तो है

सिर लाख कुचलो दिल में उठती हसरतों का पर
हसरत नई हर रोज़ ही मचलती तो है

कूँचा ए मैकदे से गुज़ारना संभल के तुम
गुजरो इधर से जब नीयत बहकती तो है .

लाचारियों की राख के अन्दर दबी हुई
आक्रोश की इक चिंगारी सुलगती तो है

इन्तेहा जुल्मों की ये देख अपनी जात पे
भीतर ही भीतर ये जमीं दहलती तो है .
~~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी 
(चित्र गूगल से साभार)


Monday, 24 July 2017

विद्रोही स्वर


विद्रोही स्वर
मन की खामोशियों को तोड़
विद्रोही हो उठते हैं स्वर|
रगों में लहू के साथ
दौड़ती चुप्पी के विरुद्ध
आवाज़ उठाना चाहते,
हर बंधन को काट
मुक्त हो
विद्रोह करना चाहते स्वर|
चेतना के अदृश्य
बंधन से मुक्त हो
करना चाहते अनर्गल प्रलाप |
मिथ्या संभ्रांतता के
जाल से निकल
उच्छृंखल हो जाना चाहते
विद्रोही स्वर|

मज़ाक अच्छा है

जो कहूँ मैं वो गलत, तेरा बयान अच्छा है।
जाने कैसे तुम लगाते हो, हिसाब अच्छा है।
रक्स, महफ़िल, मय, हँसी के दरमियाँ सुना है ,
याद हम तुमको बहुत आए मज़ाक अच्छा है।
महफिलों में चर्चा तर्के ताल्लुक का है अपने,
आजकल मेरे रक़ीबों का मिज़ाज अच्छा है।
~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

Sunday, 2 July 2017

स्वप्न और आँख

कुछ सपनों की
आंखों से नहीं बनती,
स्वप्न पूरा होने से पहले ही आंखें
खोल देती हैं पलकें
क्योंकि
आंखें हक़ीक़ी दुनिया की हैं
और सपने तिलिस्म दिखाते हैं...

Friday, 30 June 2017

सवैया गायन (video)


video

(आज सूरजभान डी. ए. वी. पब्लिक स्कूल , वसंतकुंज, दिल्ली में तीन दिन की शिक्षण संवर्धन कार्यशाला में शिक्षण संवर्धन कार्यशाला के दौरान कुछ हल्के फुल्के पल 
रस प्रीत सखी सब सूख गया, मरुभूमि बनी मन भू सगरी|
दिन-रैन झरे अँखियाँ जलधार, रहा मन शुष्क, कहाँ रस री|
मन अंकुर प्रीत फलै-पनपे, मुरझाय रहा सगरा वन री|
बदरा बन आस-निरास ठगें, झलकें, छिप जाएँ करें छल री|

Tuesday, 27 June 2017

पुर्ज़े कागज़ के नहीं, अर्ज़ियाँ हैं|

फैंक दीं तुमने जो बेकार समझ के
पुर्ज़े कागज़ के नहीं, अर्ज़ियाँ हैं|

ये जो तुम अहसां दिखा के कर रहे हो,
प्यार तो नहीं तुम्हारी खुद्गार्ज़ियाँ हैं|

कारनामें जो कल किए थे तुमने,
आज अखबारों की वो सुर्खियाँ हैं|

ज़िम्मेदारी से अभी नावाकिफ़ हो
ज़िन्दगी में अभी बेफिक्रियाँ हैं|

बाप की नज़रें जो धुंधलाईं ज़रा,
बढ़ गई बेटे की गुस्ताखियाँ हैं|

फ़िक्र समझते रहे जिसको हम,
दरअसल वो तेरी फिरकियाँ हैं|


Saturday, 24 June 2017

रंगों की पत्रकारिता

आप रंगों की पत्रकारिता करते रहिए।
प्रत्येक रंग पर 
किसी राजनैतिक दल का
ठप्पा लगाइए
और फिर रंग से जोड़कर 
घटनाओं को मनचाहा जामा पहनाइए।
रंगों के धर्म बताइए
एक रंग को दूसरे का विरोधी बताकर
आपस में और रंगों से
लड़ने के लिए उन्हें उकसाइए।
फिर वो एक रंग
जो जमीन पर बहे
उस रंग को लेकर फिर हाहाकार मचाइए।
किसी रंग को कभी चाटुकारिता का
तो किसी को आक्रामकता का
पैरोकार बताइए।
आखिर ..... ऐसे ही तो कोई धर्मनिरपेक्ष नहीं बन जाता।

हत्या या आत्महत्या ........?

पेड़ पर लटकी रस्सी
या सल्फास की गोली
नहीं थी कारण
उसकी मृत्यु का.... 
कुछ मौसमों ने साज़िश की
कुछ बाज़ार ने घेराबंदी की
कुछ वादों का जहर उसे पिलाया गया
कुछ कर्ज़ों के पत्थरों से कुचला गया
तब कहीं जाकर
किश्तों में
हत्या हुई थी उस किसान की
और नाम दिया गया
आत्महत्या....?

Thursday, 22 June 2017

यूँ अचानक आज इक मिसरा हुआ|

इश्क पर ज्यों ज्यों कड़ा पहरा हुआ|
रंग इसका और भी गहरा हुआ|

कह रहे थे तुम कि गुनती जाती मैं|
यूँ अचानक आज इक मिसरा हुआ|

मुस्कुराते तुम कि झड़ते जाते गुल|
चुन रही थी मैं अजी गजरा हुआ|

यूँ  रुका आँसू पलक की कोर पर ,
फूल पर शबनम का कण ठहरा हुआ|

चाह कर भी कह न पाए राज़े-दिल,
इस जुबां पर लाज का पहरा हुआ|

ज़िन्दगी को रू-ब-रू पाया कभी,
यूँ लगा कि मीत हो बिसरा हुआ|

नदिया के जैसी रवानी चाहिए,
सड़ने लगता आब है ठहरा हुआ|

कौन समझाए किसे, फुरसत कहाँ,
घर बुजुर्गों के बिना बिखरा हुआ|

पीछे कमरे में पड़े माँ-बाप हैं,
ज्यों कबाड़ या कि फिर कचरा हुआ|

सुनते थे इन्साफ है अंधा मगर,
साथ में शायद है अब बहरा हुआ|

था विवश कर्जे से पहले ही कृषक

मार से मौसम की अब दुहरा हुआ|

प्रश्न पूछते डरता है मन

प्रश्न पूछते डरता है मन
कि उत्तर मिला ... न मिला!
अगर मिला भी
और मन के अनुकूल न हुआ तो ?
हाँ, उत्तर तो चाहता है
पर सत्य को ...
न सुनना चाहता
न स्वीकारना |
चाहता तो बस अनुकूलता
प्रतिकूलता से घबराता है
इसलिए
प्रश्न पूछते डरता है मन...

Monday, 12 June 2017

कामनाएँ

कामनाएँ
कभी नष्ट नहीं हो पातीं,
चाहे अचेतन की गहराई में दफनाओ, 
या चेतना की आग में जलाओ
अपनी ही राख से
फिर-फिर पैदा हो जाती हैं ...
फिनिक्स जैसी|
कितनी ही बार
अपने ही हाथों क़त्ल किए जाने पर भी
अपने ही रक्त में,
फिर पनप जाती हैं
रक्तबीज-सी|
कामनाएँ .... अमरता का
न जाने कौन-सा वरदान ... या
अपूर्णता का
कौन-सा अभिशाप
साथ लेकर जन्मती हैं|
छिन्न-विछिन्न
अपने घावों को संग लिए
घिसती-भटकती है
अश्वत्थामा-सी
 ..................कामनाएँ

शालिनी रस्तौगी

तू मेरे जीवन का अमृत


तू मेरे जीवन का अमृत, तू  ही है जीवन हाला|
तू ही मधुरस है जीवन का, तू ही है विष का प्याला|
हैं कैसे तार जुड़े तुमसे, क्यों स्वर ये एकाकार हुए,
बन जीवन का गीत कभी, तुम मुझमें साकार हुए,
मन वीणा के तार छेड़, अंतर को झंकृत कर डाला|
तू मेरे जीवन ............
कभी टूटे सुर-से रूठे तुम, कभी मधुयामिनी राग हुए,
प्रीत रंग-रस सरसे तो, कभी जोगी बन विराग हुए,
शीतल मंद बयार कभी, दहके बन करके ज्वाला|
तू मेरे जीवन का अमृत ......

शालिनी रस्तौगी

Sunday, 11 June 2017

आवरण

आवरण
ढूँढ़ते हैं 
छिपाने को 
आदिम रूप हर चीज़ का
डरते हैं 
कहीं प्रकट न हों जाएँ
कामनाएँ
अपने आदिम रूप में
पहना देते हैं उन्हें
सुन्दर, आकर्षक, दिखावटी शब्दों का
भारी-भरकम जामा|
क्योंकि देह हो या विचार
किसी भी हाल
नग्नता स्वीकार्य नहीं ......
समाज को चाहिए
आवरण 

रिक्तता

रिक्तता से भरा मन         

अक्सर
बहुत शोर मचाता है|
जब न कहने को कुछ
न सुनने को बाक़ी हो,
तब अपने-आप से ही
बोलता बड़बड़ाता है|
खुद के दिए तर्क
खुद ही काटता|
बेवजह की सोच पर
वज़ह के किस्से बाँचता,
ख़लिश से कभी
तो कभी ख़ला से
घबराता, खुद से टकराता है|
कितनी बार खुद में डूब-उतर कर
फिर खाली लौट आता है|
जब रिक्त होता है ये मन
 तो जाने क्यों भर जाता है?
शालिनी रस्तौगी 

रस प्रीत सखी सब सूख गया (सवैया)


रस प्रीत सखी सब सूख गया, मरुभूमि बनी मन भू सगरी|
दिन-रैन झरे अँखियाँ जलधार, रहा मन शुष्क, कहाँ रस री|
मन अंकुर प्रीत फलै-पनपे, मुरझाय रहा सगरा वन री|
बदरा बन आस-निरास ठगें, झलकें, छिप जाएँ करें छल री|

Friday, 9 June 2017

लिख नहीं पाती कलम


लिख नहीं पाती कलम, कुछ कष्टों, कुछ पीड़ाओं को,
भाग्य ने लिख दिया स्वयं हो, चेहरे पर जिन व्यथाओं को|

घनीभूत दुःख की रेखाएँ, चित्रित कर देती हैं व्यथाएँ,
धूसर उदास रंगों से, भर जाती सारी कल्पनाएँ|
जीवन फलक पर रच दिया, चित्रकार ने यंत्रणाओं को|
लिख नहीं पाती कलम ......
यादें सुखद संयोग की, दुःख बदली बन मन पर छाती हैं,
पलकें पल-पल बोझिल होतीं, अविरल बूँदें झर जाती हैं|
तड़ित बन गिरती तड़प, बरसाती हैं उल्काओं को|
लिख नहीं पाती कलम.....
कहते सब कि नियति थी यह, हुआ वही जो होना था,
पर क्रीड़ा क्रूर विधि कि थी, ये अनहोनी का होना था|
विदीर्ण ह्रदय कैसे सँभले सुन, तथ्यहीन सांत्वनाओं को
लिख नहीं पाती कलम .....
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी


सखियाँ (सवैया)


दिन ग्रीष्म बड़े, नहिं काट कटें,मिल बैठ करें सगरी बतियाँ|
परिहास करें, मुख जोरि हँसें, हिय बात बताय रहीं सखियाँ|
कह बात पिया से हुई कब क्या, कह संग बिताइ कहाँ रतियाँ|
सनदेस पिया पहुँचाय रहीं,हिय बैन लिखें, मिल के पतियाँ||
शालिनी रस्तौगी

मालि क की रज़ा क्या है ( ग़ज़ल )

फ़िक्र में क्यों हैं गलत क्या औ वज़ा क्या है
आप क्या जाने बेअक्ली का मज़ा क्या क्या है ?.

बन गया है जो यूँ खुद मुख्तार तू अपना
जानता भी है की मालिक की रज़ा क्या है ?

कह के हाँजो तुम यूँ वादे से मुकर जाते हो
जो नहीं है यह तो फिर बोलो कज़ा क्या है ?


तीर,खंजर कैद औ फाँसी से क्या होता है,
जो पशेमां खुद उसे और सज़ा क्या है?

Sunday, 28 May 2017

माँ


माँ
💝💝💝💝💝💝💝
कौन कहता है कि सिर्फ माँ होती है माँ
कभी पिता, कभी बहन 
कभी सहेली, कभी दोस्त
कभी हमराज़, कभी मार्गदर्शक 
तो कभी गुरु बन जाती माँ।
कभी दीवार बन गलत रास्ते पर खड़ी हो जाती
कभी दरवाज़ा बन खुशियों को बुलाती
कभी छत बन कर हर मुसीबत को
अपने सर ले लेती है माँ
सिर्फ माँ नहीं होती है माँ
कभी लोरी बन नींदों को सजाती
कभी करुणा बन आँखों से छलक जाती
कभी मुस्कान बन होंठों पर कलियाँ खिलाती
कभी हौंसला बन इरादों को फौलाद बनाती है माँ
सिर्फ माँ नहीं होती है माँ
💝💝💝💝💝💝💝💝💝

Sunday, 14 May 2017

नार मनोहर

सवैया 
सोहत नार मनोहर मोहक, मोह लियो मन सारि गुलाबी।बैन बने महुआ मदिरा सम, चैन चुरावत नैन शराबी।चाल चले मनमोहक वेणि हिले कटि ठाठ दिखाय नवाबी।कौन सखी तुझ-सा बतला अब कौन मिले तुझसा रि जवाबी।~~~~~~~~~शालिनी रस्तौगी

दोहे नीति के

तुझ को घट-घट खोजती, तुझ में हुई विलीन।
मैं भी अब तू बन गई, कौन रहा अब हीन।।

मन के मैं को मार के, नीचा करके सीस।
निभते हैं रिश्ते तभी, मिट जाए जब रीस।।

हाँ ... तुम स्वतन्त्र हो

हाँ ... तुम स्वतन्त्र हो 

पूरी तरह स्वतन्त्र 
पर देखो 
इस आज़ादी का  मतलब 
कुछ गलत मत लगाना ....
जीने का पूरा हक़ है तुम्हें
पर ज़रूरत से ज्यादा साँसे मत लेना |
हक़ रखती हो बोलने का, 
अपने दिल की कहने का, 
पर देखो... 
जो अच्छा सबको लगे 
केवल वही तुम  कहना |
वैसे हर बात के लिए ... तुम आज़ाद हो 

किसने कहा कि घर की चौहद्दियों में कैद हो तुम? 
आधुनिक नारी हो ..
कोई हद भला बाँधेगी तुम्हे क्यों कर ?
पर कदम घर से बाहर रखने से पहले 
इजाजत मेरी तुम लेना| 
वैसे अपनी मर्ज़ी की मालिक हो ....हाँ 
बिलकुल स्वतन्त्र हो |
पूरी तरह आज़ाद हो तुम ...
तुम्हारे फैसले,
तुम्हारी ज़िन्दगी, 
तुम्हारी बातें, तुम्हारी साँसें, 
तुम्हारी ज़िद, तुम्हारा गुरूर
तुम्हारी हँसी.....सब कुछ  
बस तभी तक है सही 
जब तक वो मेरे अधिकार क्षेत्र में है 
बस इस अधिकार क्षेत्र की सीमा ...
इस पुरुष द्वारा खींची गई 
लक्ष्मण रेखा को ....
लाँघने का विचार 
दिल से परे रखना |
वैसे 
बाकी हर बात के लिए तुम 
पूरी तरह .... स्वतन्त्र हो?




Friday, 12 May 2017

खुद ब खुद

खुद ब खुद
होने लगती हैं अचानक
कई क्रियाएँ।
पता नहीं क्यों
पर खुद ही बाँध लिए जाते हैं
बंधन पाँव में।
चलते हुए पाँव
अचानक
समेट लेते हैं
अपनी रफ़्तार
बदल लेते हैं दिशा।
जाने कैसे
खुद ही संचालित होने लगती हैं
अनचाही गतिविधियां
कभी माथे की शिकन से,
कभी किसी नाराजगी के डर से।
और मन बड़े ही बेमन से
खुद को ही मार कर
फिर करने लग जाता है वो सब
जो हम नहीं ...... दूसरे चाहते हैं।
औरतों के दिमाग में
सदियों से फीड कर दी गई
ये स्वचालित क्रियाएँ
मौका मिलते ही
अपनी चाहतों और इच्छाओं को
एक भारी शिला के नीचे दबा
होने लग जाती हैं
खुद ब खुद
~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

कलम की नोक पर



हाथ में थमी     
कलम की नोक पर
रखी हैं न जाने
कितनी बातें, कितने अफ़साने,
शब्दों में ढलने को आतुर
हजारों ख्वाहिशें|
पर कलम की नोक से
कागज़ तक का यह सफ़र
इतना तो आसाँ नहीं,
बीच में आ घेरते हैं
न जाने कितने अंतर्द्वंद्व
बाधा बन, राह रोक
खड़ी हो जाती हैं
न जाने कितनी वर्जनाएँ|
और बंधनों के कसते दायरों में
छटपटा कर
दम तोड़ देती हैं कितनी ही कविताएँ
हाथ में थमी कलम की नोक पर.............
~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

अमर जवान ज्योति

अनगिनत दीप  
जो बुझे नहीं 
अमर हो गए ।
झिलमिलाते रहेंगे सदा 
स्मृतियों में,
जगमगाएंगे देश के पटल पर
बन सितारे,
किसी के प्राण , किसी के प्यारे,
विलीन हो गए शून्य में पर ,
शून्य नहीं अनंत हो गए।
नहीं श्रद्धांजलि,
वादा चाहते हैं हमसे,
उस अमर ज्योति के
सदा प्रज्वलन का,
जिससे प्रकाशित थे ......
वे दीप
💐💐💐💐
शालिनी रस्तौगी

एक शहर .... तब और अब

एक शहर  ... तब और अब
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
बहुत मिलनसार था कभी यह शहर 
गहरी दोस्ती हुआ करती थी गलियारों में,
गलबहियाँ डाल कर उलझे रहते थे आपस में |
रास्ते मिलते थे अपनेपन से आपस में|
चौराहे अक्सर बैठ किस्से सुनाते थे|
नैन मटक्का कभी करते छज्जे
छतों से छत को कभी पैगाम जाते थे |
पतंगे बेमतलब उलझ पड़ती थी आपस में
सूखते दुपट्टे पड़ोस जाने को बहाने बनाते थे |
वो रोशनदानों के बुलंद ठहाकों के सुर
मोहल्ले को अक्सर गुलज़ार बनाते थे|
न इतनी भीड़ थी न शोर था फिर भी
रौनक थी, चहल-पहल सी रहती थी |
एक अपनाहत थी जो चेहरों पर घरों के
बन मुस्कान हमेशा सजी संवरी सी रहती थी
बहुत खामोश रहते हैं दरवाज़े इस शहर के
खिड़कियाँ भी तो बात अब करती नहीं हैं
ओट से झाँकती चौखटों के लबों पर
जाने कैसी चुप्पी है जो यूँ पसरी हुई है
एक अबोला-सा बिखरा है गलियों में
रस्ते देख इक दूजे को मुँह अब फेर लेते हैं |
यूँ तो ज़माने भर की रौनकें हैं
भीड़ भी बेशुमार है यहाँ
कहीं कुछ खोया है तो वो अपनापन,
वो गर्माहट भरे रिश्ते हैं गुमशुदा
नज़र कैसी लगी है जाने मेरे शहर को आज
~~~~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी

सफर तुम्हारे साथ आसान हो गया

शिकवे भी रहे कुछ
शिकायत भी करते हम रहे 
हर बार तुम मुस्करा कर 
बात पर करते रहे 
बहुत की नादानियां
कभी ज़िद पर हम अड़े
कभी मुंह फुला बैठे
कभी मुंह फेर हुए खड़े।
पर तुमने न जाने कैसे
हर बात को सहा
हर बार मना कर
झगड़ा ख़त्म किया ।
नहीं कहूँगी कि फूल बिछाए थे राह में
पर काँटा भी तो कभी
कोई चुभने न दिया।
ज़िन्दगी की डगर यूँ तो आसान नहीं थी
पर सफर तुम्हारे साथ
आसान हो गया


बंद पलकों पर कोई ख्व़ाब रख दे



बंद पलकों पर कोई ख्व़ाब रख दे,
अँधेरी रातों पे माहताब रख दे,
नाम तेरा लब पे मेरे सजे है यूँ,
जैसे होंठों पे कोई गुलाब रख दे|

कष्ट देता है

कष्ट देता है अक्सर 
भावों को पी जाना 
बहुत कुछ कहना चाह कर भी 
कुछ नहीं कह पाना|
भाव, जो शब्द बन 
जुबान से निकल नहीं पाते हैं |
तेज़ाब बन कर के वो
हलक में उतर जाते हैं|
अन्दर ही अन्दर
खौलते बुदबुदाते हैं|
कहीं औरों तक न पहुँचे
आँच उनकी
यही सोच कर निशब्द
खुद ही जल जाते हैं|
किसी भाव का यूँ
अंतस में मर जाना
अक्सर
बहुत कष्ट देता हैं|
~~~~~~~~~~~~~~~
शालिनी रस्तौगी
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